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सुबह सुबह subah subah

सुबह सुबह एक ख्वाब कि दस्तक पे दरवाज़ा खोला देखा सरहद के उस पार बाहर से कुछ मेहमा आये है आँखों से मायूस थे सारे चेहरे सारे सुने सुनाये पाँव धोये हाथ धुलाये आँगन में आसन लगवाए और तंदूर पे मक्के के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए पोटली में मेहमा मेरे पिछली सालो के फसलो का गूढ़ लाये थे ..... .... आँख खुली तोह देखा घर में कोई नहीं था हाथ लगा कर देखा तो तंदूर अभी तक बुझा नहीं था और होठो पे मीठे मीठे गूढ़ का जायका अब तक चिपक रहा था ....... ख्वाब था शायद ख्वाब ही होगा ...... सरहद पे कल रात सुना है चली थी गोली सरहद पे कल रात सुना है कुछ ख्वाबो का खून हुवा है.

गुलज़ार साहेब