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Sunday, January 17, 2010

कही दूर जब दिन ढल जाए......

कही दूर जब दिन ढल जाए
मरीन लाइंस कि जगत पर बैठे
आँखों में मेरे,
कुछ पानी आये
...
देखू परिंदों को
जाते हुवे
अपने घर
हा....
अपने घर !!!


कितना आसान है उनके लिए
एक जगह चुन ना
और बना लेना अपना घर
इंसानों कि पहुँच से दूर
....
....
दिन में खाना चुगते है
और शाम को ही
चैन से सो जाते है
..
एक मै हु
-- इंसान
थकाहारा, परेशान


चूहों कि दौड़ में
ऐसे फंसे
के गाव से इस बड़े शहर में आये
...
घर से बेघर हुवे
....

पेड़ो के जंगलो से-
मकानों के जंगलो में
जहा अपना
कोई सहारा नहीं.
जहा सिक्के गिन के
हाथ खुरदुरा कर लेते है लोग
ऐसा
के छुअन को भी
ना महसूस कर सके
...
...
घर से दूर
वो पहला साल
खूब रुलाता है
जाड़े कि नर्म धुप
और छत का सजीला
वो कोना याद आता है
पके हुवे आलू, मूंगफली के दाने
और वो
दोस्तों कि खुस पुसाहट
हंसी के ठहाके
हमेशा
मम्मी और अप्पी के तमाशे
याद आते है
वो हाथो को बगलों में दबाये
चाय का भगोना
और
ऐसा
के सब
बातो में गम रहते थे
किसी को
कोई फर्क नहीं पड़ता था
रजाई के अन्दर
वो चैन से सोना
सुबह कि चाय पीने के बाद भी


छत पे
खरगोशों से खेलना
अच्छे दिन थे वो भी ,
....
.....
यहाँ इन
मकानों के जंगल में
अपना कोई सहारा नहीं
कोई पूछता नहीं
मतलबी लोग
मतलबी बाते
.....
.....
वो दिन ढलते थे इस तरह
आज से चार साल पहले
जब बम्बई में
मै आया था !!!!!!

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