ज़िन्दगी को मारो और गडे मुर्दे उखाडो

गुजरात के चुनावों के नतीजे आ गए. लोगो ने कहा भाजपा जीत गयी, भाजपा खेमे में खुशिया छा गयी जबकि कांग्रेसी खेमे में मायूसी . कइयो ने एक दुसरो से पुछा की आपका क्या विचार है . भई विचार है तो तब व्यक्त करते जब विचार की जीत होती . ये कामो की जीत थोड़े ही न है कारनामो की जीत है . भाजपा की जीत नहीं हुई थी, नरेन्द्र मोदी की जीत हुई थी. व्यक्ति की जीत नहीं हुई थी उन मुर्दों की जीत हुई थी जिन्हें गोधरा में भून दिया गया, किसने भूना नहीं पता किसीको, पर कहा गया के मुसलमानों ने भूना और नरेन्द्र मोदी ने उन भुने हुवे लोगो को और भी भुनाया. किसी व्यक्ति को बनाने में मरे हुए लोग भी बड़ा योगदान दे सकते है. हमें अब मारे गए लोगो की कीमत कम नहीं आंकनी चाहिए. कुछ लोगो के द्वारा गोधरा में क्रूरतम कृत्या नहीं किया जाता तो गुजरात से नरेन्द्र मोदी गुज़र गए होते. उस गोधरा ने इससे धरा नहीं दिखाई बल्कि आसमान में बिठा दिया. इन नतीजो से ही सिध्ध होता है की इस देश में जिंदा लोगो से ज्यादा निर्णायक भूमिकाए मुर्दे उठाते है.

एक इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद पुरे देश में जो गुस्से और सहानुभूति की लहर पैदा हुई उसने कांग्रेस को चुनाव में अभूतपूर्व सफलता दिलवाई. बहुत संवेदना वाला देश है. इसमें किसी को मारने में तकलीफ नहीं होती पर किसी के मरने पे जो संवेदना उत्पन्न होती है वो दुनिया में कही देखा नहीं जा सकता .

दिलकश

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