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Saturday, December 13, 2008

मोमबत्ती की लौ

रात भी ऐसी ही
जब थी निशि की बेला
मानस में छाया था
भावो का ही मेला

जैसे अपने प्रेमी से
रूठी हो मानिनी
वैसे ही रूठ गयी
सदन मध्य दामिनी

गुल हो गयी प्रकाश किरण
अन्धकार हो गया
मोमबत्ती मै जला कर
लिखने में खो गया

मोमबत्ती की लौ को
पाया कुछ कांपते
देखा मै पलभर
देखा मै हाँफते

कभी पूरब कभी पश्चिम
कभी उत्तर तो कभी दक्षिण

घूमती थी लौ इसकी
इतस्ततः
पल पल छिन्न

कभी तीखी, कभी फीकी
कभी पीली, कभी उजली

कभी खिले पुष्प सी
कभी ज्यो अधखिली कलि

देख उसे भाव कुछ
मेरे मन में भर आये
दर्दो के नाम कुछ
मुख पे उतर आये

पूछा मै
ऐ मोमबत्ती ! !
दिशा क्यों बदलती हो

क्यों न स्थिर भाव से
रात भर जलती हो
होता है यदा कदा
दिशाओ का परिवर्तन
ऐ मोमबत्ती की लौ !!
करती क्यों हो नर्तन

बोली वह पूरब में एक कन्या जली है आज
बिन दहेज़ आई थी इसलिए गिरी गाज
बोली वह उत्तर में
एक मानव हुआ है नंगा
कई कोस आगे चल
आज हुआ है दंगा

उत्तर में हत्या दक्षिण में अपहरण

यदा कदा यत्र तत्र
ऐसे ही है हुए चरण
कोई विश्वास में अपने को छलता है
तोह गिरगिट सा रंग जब कोई बदलता है .

मै प्रतीक बन उनका
बस संवर जाती हु
मरते जब आदमी

मै भी मर जाती हु

कही पड़ा भिक्षुक शव

मै समाज का प्रतीक
मै मोमबत्ती की लौ

आंधी आयी एक
मोमबत्ती गयी गुल
बाहर सुबह हुई
अँधेरा गया खुल

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