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Wednesday, October 22, 2008

~ चलो घास की एक छतरी बुने ....

~ चलो घास की एक छतरी बुने ....


हरी हरी घास, कुछ छोटे छोटे फूलो वाली घास. छतरी की डंडी हो इस छोटे से गुलाब के पौधे की जो इस समय यहाँ पर ऊगा है, घास की छतरी, गुलाब के टहनी के डंडी वाली .....
जिसे जब भी मै अपने ऊपर तान के चालू, मकानों के छज्जो पे खड़े लोग इर्ष्या करे इस से
क्यूंकि उनके पास जो नहीं ... काश ये घास कभी न सूखे, गुलाब की टहनी हमेशा हरी रहे और वो छोटे छोटे फूल कभी न झडे .... कितना अच्छा हो अगर ऐसा हो तो .... पर इतना कुछ सोचने पर मन में आनंद और दुःख भरी व्यग्रता समान मात्रा में क्यों आ रही है ? विचार आता है के काश मुझे ये सब कुछ करना ही न पड़ता. क्यों बनाई मैंने ये घास की छतरी और क्यों आशावान हु की ये कभी न सूखे ..... बताओ क्यों ? .... समय रहते उस जगह से अगर मैंने घास और पौधे न हटाए होते तो रौंद दिए जाते बड़े बेदर्दी से ..... बेदर्दी ? मन ने कहा ... पौधो को दर्द थोड़े न होता है ... फिर हँसा वो .... मन तो किया के बताऊ मन को क्या होता है दर्द ...!
आज उसी जगह पे एक गगनचुम्बी इमारत है, जिसके नीचे से जब भी मै अपनी घास की छतरी लिए गुज़रता हु, छज्जो पे खड़े लोग इर्ष्या से मुझे देखते है और हंसते भी है. पर मुझे उनकी खोखली इर्ष्या और हसी पर बड़ी हंसी आती है .... मै उनको अपनी छतरी की छोटी छोटी छेदों से देखता हु, और ठहाके मारता गुज़र जाता हु, लेकिन थोडी दूर आगे जाके मेरी हंसी थम जाती है, भाव बदल जाते है मेरे ... सोचने लगता हु के काश किसी को ऐसी छतरी बनाने की ज़रुरत न पड़े .... काश जो लोग ऊपर से बिना मुझे देख पाए हस रहे है वो मुझे देखे और जान पाए के मै उनका भविष्य हु, मै उनके उस भविष्य को चित्रित करता हु जहा धरती पर हरा रंग नहीं दिखता कही ... धरती काली दिखती है अन्तरिक्ष से ! पर शर्म आती है मुझे अपने धत्त्कार्मो पर, और नहीं चाहता के वो देखे मुझे
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इसी लिए तान रखी है मैंने घास की छतरी , गुलाब की टहनी वाली .
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courtesy
~ पंखुडी
24/09/2004

दिलकश

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